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Thursday, August 2, 2007

मेरी महाभारत

अब
युद्ध होगा
एक नहीं
प्रत्येक के
विरुद्ध होगा

फिर चढेगी
प्रत्यंचा गांडीव पर
फिर कहीँ कोई
सुयोधन क्रुद्ध होगा

ना जाने कैसे
समझाऊँ ह्रदय को
कैसे यह
बताऊं उसको, कि
गांधारी का प्रेम
आज भी मेरे लिए
अनिरुद्ध होगा

हाँ आज मैं
अर्जुन हूँ
अपनों से लडूँगा
ना आज कोई कृष्ण
ना भीष्म, द्रोण
ना ही युधिष्ठिर का चरित्र
अशुद्ध होगा

होगी तो बस
आज वो महाभारत
जिसमे तुम्हारी जीत
और अपनी हार देखकर
मेरा ह्रदय फिर एक बार
तृप्त होगा
मुग्ध होगा...
- गौरव चौहान
कहते हैं
टूटते तारे को देख कर,
जो भी माँगो
मिल जाता है ।
मुझे इंतज़ार है
सूरज के टूटने का
क्योंकि मेरी मांगे
कुछ ज्यादा ही बड़ी हैं ।
- गौरव चौहान